Tuesday, December 6, 2022

पतझड़


मेरे पसंदीदा व्यक्ति, 
शहर और रुचियां 
मुझसे दूर भागते रहे हैं।
जो पीछे छूटे
फिर कभी वापिस नहीं आए। 
सोचता हूँ  
आखिर इस हिज्र-ज़दा की नियति क्या है?
तो पाता हूँ
मैं वो बर्ग-ए-ख़िज़ाँ-रसीदा हूँ 
जिसे पतझड़ ने ही सँवारा है। 


हिज्र-ज़दा: अकेलेपन का मारा
बर्ग-ए-ख़िज़ाँ-रसीदा: वह पता जिसे पतझड़ ने पिला कर दिया हो। 

Friday, February 12, 2021

प्रश्न

वैसे वह उन सभी शब्दों के बीच मौजूद तो था
पर बीच में न उसे कोई कौमा, 
न कोई सेमी कोलन,
और न ही कोई हाइफन मिली,
पूर्ण विराम की प्रतीक्षा में 
अंततः वह प्रश्न ही बना रहा?


Wednesday, September 30, 2020

बलात्कारी का लिंग

ये जो पुरुष लिंग है,
बलात्कार का भी प्रतीक है!
बलात्कारी को इतनी ताकत मिलती कहाँ से है
कि उसे डर नहीं होता कानून का! 
उसे मिलती हैताकत 
पितृसत्ता के मनोबल से,
प्रशासन के सहयोग से,
राजनीति की विद्रूपताओं से
जातियों के अहम अहंकार से
लिंगोत्थान के इश्तेहार से।
बलात्कारियों को यूँ ही 
कभी अपराधबोध नहीं होता
क्योंकि वे अपने लिंग को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।
यह लिंगदोष है! पितृसत्ता का!!
इस लिंगदोष के पीछे खड़े 
ताकतों को कुचला जाना जरूरी है।

 


Thursday, April 23, 2020

प्रेम में मासूमियत, सम्मान और परिपक्वता का जब मेल होता है तो वह कविता, कला होते हुए अंततः अखण्ड हो जाता है। लोग ईश्वर से प्रेम से करते हैं लेकिन वे नहीं जानते ईश्वर भी उन्हें प्रेम करता है या नहीं, वे तो बस ईश्वर की कृपा की प्रार्थना करते हैं। ईश्वर से जिद नहीं करते कि बदले में ईश्वर भी वैसा ही करे। तो इंसान जिसे हम प्रेम करते हैं, जरूरी तो नहीं कि बदले में वो भी वैसा ही प्रेम करे। प्रेम को पा लेने की अभिलाषा या पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिलाषा प्रेम के निहितार्थ को संकुचित करता है।  प्रेम एक तरफा हो या दो तरफा, प्रेम सीधे रास्ता चलता है। उसे दाएँ- बायें चलना नहीं आता। प्रेम एक एहसास है। ये एहसास हर किसी के लिए अलग-अलग ही है। दो लोग आपस में प्रेम में होते हुए भी बराबर का आदान-प्रदान नहीं करते हैं। दोनों के लिए यह महसूस भी अलग-अलग ही होता है। ज्यादा की उम्मीद करना प्रेम नहीं, बल्कि बदले की उम्मीद भर है। दूसरे संदर्भ में, एक तरफा प्रेम भी किसी अन्य प्रेम के जितना ही गहरा ,पवित्र और सकारात्मक हो सकता है। प्रेम का स्वरूप चाहे जो भी हो, प्रेम की अनुभूति को अपने-अपने दायरे में जीना भी तो जिंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफ़ा है।

Sunday, April 19, 2020

एक तालाब की मछली
नदी के पास आने का
सपना देखा करती थी
कई बरसात निकले
पर नदी पास नहीं आई
एक दिन तालाब सूख गई
मछली भी अपने अधूरे सपनों
सहित जमींदोज हो गई
कहते हैं हर बरसात में
वो मछली उसी तालाब में
फिर से जिंदा हो जाती है
इस उम्मीद में कि
नदी आएगी
बाढ़ लाएगी
और वह नदी में विलीन हो जाएगी 

Tuesday, March 10, 2020

तुम मेरी धरती हो

चाहता तो हूँ, तुम्हें
लेकिन इसलिए नहीं की
तुम मेरी हो जाओ

मैं तुम्हें पाना नहीं
तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ
जैसे चाँद जीता है
धरती के लिए
हमारा जन्म सिर्फ मरने के लिए नहीं हुआ है। हम दुनिया को कुछ देने के लिए आये हैं। हम कुछ देकर ही जाएंगे। हम दुनिया के खूबसूरती में कुछ जोड़ने आये हैं। लाख परिस्थितियां प्रतिकूल हो, हम उसे अनुकूल बनाएंगे। हम किसी भी हालात में अराजक नहीं होंगे। जिनमें संभावना है उनके ही जीवन में दुख है। फूलों की जिंदगी छोटी होती है लेकिन वे हमेशा फूलों को ही जन्म देते हैं। हम भी कोमलता को ही पैदा करेंगे और एक दिन चुपचाप चले जाएंगे। 
बहुत सी ऊंचाईयां या तो हम प्रेम में होते हुए प्राप्त करते हैं या बहुत सी ऊंचाईयां प्रेम से वंचित होने के कारण प्राप्त करते हैं। पर हर हालात में प्रेम ही सर्वोपरी है। प्रेम का इस दुनिया में कोई विकल्प नहीं होता। जितना मृत्यु सत्य है, उतना ही प्रेम भी सत्य है। 
फासले इतना ज्यादा है कि
अब उन्हें फोन में ढूंढते हैं।

Sunday, February 23, 2020

आधा अधूरा


यह जानते हुए भी कि
आधा हूँ- अधूरा हूँ
स्थापित हूँ- विस्थापित हूँ
शापित हूँ- निर्वासित हूँ
आह! ज़माने के पैमाने से भी
गैर मुनासिब हूँ
फिर भी उनके उदास मौसम का
वसंत क्यों होना चाहता हूँ?


Friday, February 7, 2020

ऐ दौरे जिंदगी
मत करना मुझे किसी और की जिंदगी में दाखिल
तेरी फरमाइशों की जद्दोजहद इतनी लंबी है
मैं शायद कभी पूरा ही नहीं कर पाऊँ

Sunday, November 24, 2019

मन की नदी

वो नदी के तट पर बैठा
नदी को अपलक निहारता रहा था
नदी भी थोड़ी शांत थी
नदी ने धीरे से कहा ऐसे मत निहारो
मैं सूख जाऊंगी
वो कुछ कह पाता
पल भर में ही
नदी सचमुच सूख गयी थी
बदहवासी में वो नदी को रात भर पुकारता रहा था
उसके शब्द निर्रथक हो चुके थे
उसकी आवाज़ चली गई थी
और नदी अदृश्य हो चुकी थी
जिन पगडंडियों के जरिये वो नदी से मिला था
वे भी उसके साथ छोड़ चुके थे
आज भी 
जब भी बरसात आती है
वह नदी को ढूंढ़ने निकल जाता है।

Wednesday, October 16, 2019

मैं कोई चमकता तारा नहीं था
मैं एक धूमकेतु था
धरती की चाहत में
आसमान में ही टूटकर
बिखड़ जाना
मेरी नियति थी।
मैं पर्वत जैसा होना चाहता था 
ऊपर से मैं तुम्हें अपनी तलहटी में
बहती हुई नदी की तरह देखना चाहता था। 
अब मैं नदी हो जाना चाहता हूँ। 
तुम चाहो तो 
पर्वत बन जाना।  
मैंने पहला पत्र एक कौवे को लिखा था- और वो भी अपनी डायरी में। उस वक़्त मैं चौथी में पढ़ता था। हुआ यूँ था कि एक मित्र ने मुझे जादू दिखाया और दावा किया कि वो एक रुपये को दो सिक्के में बदल देगा। उसने एक लिफाफे में ब्रेड का टुकड़ा, थोड़ा कोयला का राख रखकर ऊपर हवा में उछाला। मैं ऊपर देखा और नीचे दो सिक्के दिखे। एक दिन अकेले में मैंने इसे आजमाने का सोचा। मैंने उसी तरह लिफाफे में ब्रेड और कोयले का राख रखा। मैंने जैसे ही लिफाफे को हवा में उछाला, पता नहीं एक कौवे ने कब से घात लगा बैठा था वो ऊपर से ही लिफाफे को लपक कर उड़ कर बिलिंग के मुडेर पर बैठ गया था। मैं बहुत निराश था क्योंकि वे उस दिन के मेरे पास आखिरी सिक्के बचे हुए थे। तब से अब तक कोई न कोई मेरे उस लिफाफे को लेकर उड़ता रहा है। मैं उस सिक्के के इंतजार में आज भी जी रहा हूँ।

Thursday, July 25, 2019


मैं गुमशुम हूँ
ग़मज़दा नहीं
शब्दों के इस ताकतवर दुनिया में
मेरे मासूम से शब्द कहीं गुम हो गए हैं
मैं उन्हीं की तलाश में हूँ
जो बचपन से गुमशुदा हैं
मिल जाते तो शायद
दिन की तरह
रात भी अपना होता

Thursday, April 25, 2019

इस आधे अधूरे जीवन में
कहाँ मिलती है पूर्णता
तन और मन का द्वंद्ध
करता है अक्सर सपनों को लहूलुहान

मन भटकता है जब किसी के मन के लिए,
जाति, धर्म, रीतिरिवाज की दीवारें खड़ी हो जाती हैं।
जीवन को चाहिए होता है एक कंधे की तलाश, पर
अक्सर यहाँ कंधे भी परिवारों के गिरवी होते हैं।
इस तरह कभी मिलता है अगर मन
तो एक मजबूत कंधा नहीं मिलता।
उदास शाम के बीच झूलती यह जिंदगी
एक स्वायत मन की, एक मजबूत कंधे की
करती रहती है एक अंतहीन प्रतीक्षा।

Sunday, April 21, 2019

तुम नहीं आओगी

मालूम है,
तुम नहीं आओगी
फिर भी तुम्हारा बहुत कुछ रह जाएगा
मेरे ही पास।

जैसे तुम्हारी आँखे
तुम्हारी आँसू
तुम्हारी हँसी
तुम्हारी सादगी
हमारी अनर्गल बातें
वो पगडंडियां
वो रेस्त्रायें
तुम्हारी कविताएं
तुम्हारी किताबें
थोड़ा सा मनमुटाव
थोड़ी सी उलझन
फिर एक अनकही रहस्मय चुप्पी का पसर जाना
और बेबसी में हालात से समझौता
कितना कुछ तो है तुम्हारा
अभी भी मेरे पास।

तुम्हारा ये कहना कि
मैंने कभी सोची नहीं थी
कोई मुझे भी इतना टूटकर चाह सकता है
यही है मेरी सबसे प्यारी यादें
मेरा प्यार धन्य हो गया है

हाँ, अभी मेरे पास कोई गीत नहीं है,
लेकिन एक दिन मैं रचूंगा,
दुनिया का सबसे खूबसूरत गीत तुम्हारे लिए।
मुझे मालूम है
तुम फिर भी नहीं आओगी!