तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ
जैसे चाँद जीता है
धरती के लिए
दिन भर तपती है धरती जब सूरज की आग में
गुस्से में लाल पीली हो जाती है शाम में
शाम ढ़लते ही तब
चुपके से आता है चाँद बाहर
धरती के लिए
दिन भर तपती है धरती जब सूरज की आग में
गुस्से में लाल पीली हो जाती है शाम में
शाम ढ़लते ही तब
चुपके से आता है चाँद बाहर
धरती के उलझन देख, चुपचाप उसे सुलझाता है
करता है अपनी रौशनी से धरती को शीतल
धरती खुश होती है चाँद के इस ख्याल से
धरती खुश होती है चाँद के इस ख्याल से
याद करती है जब धरती उसे दिल से
वह अधूरा से पूरा होकर पूर्णिमा बन जाता है
पर चाँद की नियति है
आधा अधूरा रहना
कभी चमचमाना
तो कभी स्याह अंधरे में डूब जाना
वह जितना शोख़ है, उतना ही है अकेला
वह जितना शोख़ है, उतना ही है अकेला
तमाम चमकते तारों के बीच
उसे बचाना होता है अपना वजूद
इसके लिए उसे जाना पड़ता है धरती से दूर
इस फासले से धरती होती है ख़फा
फिर कई दिनों तक रहता है वह संताप में
कमी आ जाती है उसके भी प्रताप में
वह गुम होता जाता है, इतना गुम कि
वह बन जाता है अमावस की रात
वह गुम होता जाता है, इतना गुम कि
वह बन जाता है अमावस की रात
धरती भी डूब जाती है अथाह अँधेरे में
स्याह अंधरा करता है दोनों को ही बीमार
धरती समझ जाती है चाँद की लाचारी
स्याह अंधरा करता है दोनों को ही बीमार
धरती समझ जाती है चाँद की लाचारी
चाँद भी चाहता है धरती को टूटकर
रात जागकर करता है उसकी तीमारदारी
करता है धरती को चाँद रौशन
होते हैं दोनों के गिले शिकवे दूर
होते हैं दोनों के गिले शिकवे दूर
चाँद फिर से खिलखिला उठता है
धरती के सीने में भी उठता है ज्वार
रचते हैं दोनों सौदर्य की अप्रतिम कविता
अँधेरा छंटता है होता है सवेरा
इस तरह फिर से होती है उनकी दुनिया गुलजार
हाँ, मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
उसी तरह जैसे चाँद करता है
अँधेरा छंटता है होता है सवेरा
इस तरह फिर से होती है उनकी दुनिया गुलजार
हाँ, मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
उसी तरह जैसे चाँद करता है
धरती से
तुम मेरी धरती हो !
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