देखो साँझ
ये जो
तुम रोजाना आ जाती हो
घनघोर अंधेरा बनकर
और भर देती हो मेरे अंदर ‘शून्य’
फिर भी,
ये जो
तुम रोजाना आ जाती हो
घनघोर अंधेरा बनकर
और भर देती हो मेरे अंदर ‘शून्य’
फिर भी,
हर रोज तुमसे लड़ते हुए
प्रकाश का एक बिंब तो पैदा कर ही लेता हूँ
प्रकाश का एक बिंब तो पैदा कर ही लेता हूँ
इस गहन उदासी में भी एक कतरा तो जी ही लेता हूँ
मैं तमाम उम्र इसी तरह
मैं तमाम उम्र इसी तरह
हर शाम,
इस अंधेरे से लड़ने के लिए तैयार मिलूँगा
देखों साँझ,
कलम से कर ली है मैंने दोस्ती
सुकून है कि अब
अंधेरे को 'उजाला' लिखा करूँगा
डर को 'जीत' लिखा करूँगा
नफरत को प्यार लिखा करूँगा
पर प्यार को 'प्यार' ही लिखूँगा
और इस तरह
मैं, तुम्हें
इस दुनिया में मासूम हँसी को बचाता हुआ मिलूँगा
मेरा विश्वास है,
एक दिन तुम भी अपनी संपूर्णता के साथ
मुझ में समा जाना चाहोगी
इस अंधेरे से लड़ने के लिए तैयार मिलूँगा
देखों साँझ,
कलम से कर ली है मैंने दोस्ती
सुकून है कि अब
अंधेरे को 'उजाला' लिखा करूँगा
डर को 'जीत' लिखा करूँगा
नफरत को प्यार लिखा करूँगा
पर प्यार को 'प्यार' ही लिखूँगा
और इस तरह
मैं, तुम्हें
इस दुनिया में मासूम हँसी को बचाता हुआ मिलूँगा
मेरा विश्वास है,
एक दिन तुम भी अपनी संपूर्णता के साथ
मुझ में समा जाना चाहोगी
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