प्रेम में मासूमियत, सम्मान और परिपक्वता का जब मेल होता है तो वह कविता, कला होते हुए अंततः अखण्ड हो जाता है। लोग ईश्वर से प्रेम से करते हैं लेकिन वे नहीं जानते ईश्वर भी उन्हें प्रेम करता है या नहीं, वे तो बस ईश्वर की कृपा की प्रार्थना करते हैं। ईश्वर से जिद नहीं करते कि बदले में ईश्वर भी वैसा ही करे। तो इंसान जिसे हम प्रेम करते हैं, जरूरी तो नहीं कि बदले में वो भी वैसा ही प्रेम करे। प्रेम को पा लेने की अभिलाषा या पारस्परिक आदान-प्रदान की अभिलाषा प्रेम के निहितार्थ को संकुचित करता है। प्रेम एक तरफा हो या दो तरफा, प्रेम सीधे रास्ता चलता है। उसे दाएँ- बायें चलना नहीं आता। प्रेम एक एहसास है। ये एहसास हर किसी के लिए अलग-अलग ही है। दो लोग आपस में प्रेम में होते हुए भी बराबर का आदान-प्रदान नहीं करते हैं। दोनों के लिए यह महसूस भी अलग-अलग ही होता है। ज्यादा की उम्मीद करना प्रेम नहीं, बल्कि बदले की उम्मीद भर है। दूसरे संदर्भ में, एक तरफा प्रेम भी किसी अन्य प्रेम के जितना ही गहरा ,पवित्र और सकारात्मक हो सकता है। प्रेम का स्वरूप चाहे जो भी हो, प्रेम की अनुभूति को अपने-अपने दायरे में जीना भी तो जिंदगी का सबसे खूबसूरत तोहफ़ा है।
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