इस आधे अधूरे जीवन में
कहाँ मिलती है पूर्णता
तन और मन का द्वंद्ध
करता है अक्सर सपनों को लहूलुहान
मन भटकता है जब किसी के मन के लिए,
जाति, धर्म, रीतिरिवाज की दीवारें खड़ी हो जाती हैं।
जीवन को चाहिए होता है एक कंधे की तलाश, पर
अक्सर यहाँ कंधे भी परिवारों के गिरवी होते हैं।
इस तरह कभी मिलता है अगर मन
तो एक मजबूत कंधा नहीं मिलता।
उदास शाम के बीच झूलती यह जिंदगी
एक स्वायत मन की, एक मजबूत कंधे की
करती रहती है एक अंतहीन प्रतीक्षा।
कहाँ मिलती है पूर्णता
तन और मन का द्वंद्ध
करता है अक्सर सपनों को लहूलुहान
मन भटकता है जब किसी के मन के लिए,
जाति, धर्म, रीतिरिवाज की दीवारें खड़ी हो जाती हैं।
जीवन को चाहिए होता है एक कंधे की तलाश, पर
अक्सर यहाँ कंधे भी परिवारों के गिरवी होते हैं।
इस तरह कभी मिलता है अगर मन
तो एक मजबूत कंधा नहीं मिलता।
उदास शाम के बीच झूलती यह जिंदगी
एक स्वायत मन की, एक मजबूत कंधे की
करती रहती है एक अंतहीन प्रतीक्षा।
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