Thursday, April 25, 2019

इस आधे अधूरे जीवन में
कहाँ मिलती है पूर्णता
तन और मन का द्वंद्ध
करता है अक्सर सपनों को लहूलुहान

मन भटकता है जब किसी के मन के लिए,
जाति, धर्म, रीतिरिवाज की दीवारें खड़ी हो जाती हैं।
जीवन को चाहिए होता है एक कंधे की तलाश, पर
अक्सर यहाँ कंधे भी परिवारों के गिरवी होते हैं।
इस तरह कभी मिलता है अगर मन
तो एक मजबूत कंधा नहीं मिलता।
उदास शाम के बीच झूलती यह जिंदगी
एक स्वायत मन की, एक मजबूत कंधे की
करती रहती है एक अंतहीन प्रतीक्षा।

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