अभी जो # मी टू
आंदोलन है वो एक पुरुष विशेषाधिकार के खिलाफ अपनी पहचान का भी एक आंदोलन है और इस
आंदोलन ने एक झटके में पुरूषों के सोचने के रवैये में थोड़ा बदलाव तो लाया ही है।
इसे आप उच्च और कुलीन महिलाओं का सवाल कहकर खारिज नहीं कर सकते। इससे महिलाओं के
सवाल पर पुनः विमर्श बढ़ा है। इसी तरह दलित और आदिवासियों के बौद्धिक वर्ग के
सक्रियता को यह कहकर खारिज नही कर सकते कि वे अपने समुदाय का सही प्रतिनिधित्व
नहीं करते हैं। राजनीति और बौद्धिकता दोनों अलग अलग विषयों का प्रतिनिधित्व करते
हैं। प्रतिनिधित्व के लिए हमें ऊपरी पायदान पर पहुँचना ही पड़ता है। कमजोरों के
आंदोलन को एक जमीनी बौद्धिक खुराक की जरूरत पड़ती ही है। इसलिए हक जमाये हुए लोग
जमीन से जुड़े बौद्धिक वर्ग से ज्यादा नफरत करते हैं। तमाम तरह के आस्थाविहीन, अराजकतावादी रूपक का इस्तेमाल कर उनका दमन किया जाता रहा
है। सवाल है कि सवाल उठाने वालों से कौन डरता है? विशेषाधिकार जमाये लोग न सिर्फ सवालों से डरते हैं बल्कि
सवाल उठाने वाले का दमन भी करते हैं।
यह ठीक है कि # मी टू एक वर्गीय परिघटना है। जिसके पात्र दोनों तरफ से बौद्धिक वर्ग हैं। यह कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक आंदोलन
है . यह बौद्धिक स्त्री-पुरुषों का विमर्श है और अगर फ्रेंच फिलॉसफर जैक देरिदा के
मार्फ़त कहें तो यह बौद्धिक विखंडन (डीकंस्ट्रक्शन) की एक प्रक्रिया है, जहाँ टेक्स्ट
को ही यदि विमर्श के जरिये उघाड़ा जाए तो हमारे टेक्सचर का पता चलता है कि वास्तव
में हम कितना दोहरा व्यक्तित्व जीते हैं? गाँव, देहात और छोटे शहरों की स्त्रियों की आपबीती भी एक अनकही
कहानी है। घास काटने वाली और जंगलो में लकड़ी काटने वाली औरतों का भी अपना # मी टू है। हाँ, वे खुद
विमर्श करने की स्थिति में नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वे अनभिज्ञ हैं या
चेतनशील नहीं है बस ये है कि उनके पास # मी टू जैसा प्लेटफार्म या कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं है। लेकिन
इसका अर्थ ये नहीं है कि जिनके बारे में लिखा जा रहा है, विमर्श किया जा रहा है
उसका असर नीचे तक नहीं होता है. यह सही है कि कानून ज्यादातर मामलों में
सुविधाभोगी लोगो का ही पक्षधर होता है.
पहले जो यौन उत्पीड़न होता था उसे बौद्धिक लोग कहानियों या उपन्यासों का पात्र
बनाते थे। आज वे पात्र खुद जिंदा हो गए हैं तो इतनी तकलीफ नहीं होनी चाहिए . महिलाओं
पर अपनी कलम चलाकर बहुत लोग बौद्धिकता के बादशाह बन गए थे. अब उनके पात्र ही जिंदा
हो गए हैं. उन्होंने अपने बल-छल से उन्हें जिंदा ही मार दिया था. अब तक वे अपने
मेथड से उत्पीड़ित का इतिहास लिख रहे थे अब उत्पीड़ित उनका इतिहास लिख रहा है.
उन्हें दिक्कत है कि उनके ही मेथड से उनका इतिहास क्यों नही लिखा जा रहा? जाहिर
है उत्पीड़ित - उत्पीड़क का ऐसा मेथड क्यों अपनाएगा, जो वर्चस्व पर आधारित रहा हो?
उनके लिए अब # मी टू प्लेटफार्म का उपयोग हो रहा है क्योंकि उन्होंने उनकी आवाज को कई माध्यम से दबा
रखा था. हमने ने ही उन सारी प्रक्रियाओं को मिथक में बदल दिया था कि तुम चाहे जो
कर लो तुम मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते. कुछ लोगों का कहना है कि यह सब स्टंट है, नाम
कमाने का. पुराना रंजिश का बदला लेने का. अगर जब चीजे पब्लिक डोमेन में आती है तो
उसे यूँ ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. यह सब विमर्श का मामला है. इस तरह के विमर्श
हमें खुद के अंदर झाकने का मौका देता है.
अब घरों से महिलाएं बाहर निकल रही हैं जाहिर है पुरुष वर्चस्व का पुराना
मेथड टूटेगा. सवाल है जब हम अपने ही मेथड
के साथ खुद वस्तुनिष्ठ नहीं रहे तो हमारे लिए लिए भी वस्तुनिष्ठ मेथड का इस्तेमाल
कैसे होगा?
यौन
उत्पीड़न को आप हमेशा वस्तुनिष्ठ (साक्ष्य केन्द्रित) तौर पर कैसे देख सकते हैं? इसका असर तो मन
मस्तिष्क पर होता है. बालात्कार की
परिभाषा ही खुद में किसी महिला के लिए कितना अवसाद पैदा करता है. यह आपबीती वस्तुनिष्ठ भी हो सकती है और
विषयनिष्ठ भी. हर अनुभव को अतिरेक कहकर टाला नहीं जा सकता है. यह सब हम फिल्मी
अंदाज में फिल्मों में देखते ही रहते हैं. बंद कमरे का समाजशास्त्र तो वैसे भी तुलनात्मक
विधियों से ही ज्यादा वस्तुनिष्ठ होगा. बंद कमरे में या तो सामान्य घटना घटती है
या असामान्य। बड़े कोठियों में अक्सर कांच टूटने का शोर दब जाता है। यौन उत्पीड़न के
आंकड़े थानों में दर्ज होते हैं लेकिन जो दर्ज नही है इसका मतलब ये नहीं है कि वो
आख्यान सच नहीं है जो आकड़ों में दर्ज नही है। आख्यान अब विमर्श का हिस्सा है और
विमर्श सत्य तक पहुँचने का माध्यम भी है। अगर विमर्श न होता तो आज महिला, दलित और आदिवासियों पर विमर्श की गुंजाइश ही नहीं होती। 'माता के देश में', और 'फल की
चिंता के बजाये कर्म करो', वाले देश में आज स्त्रियां और कर्मकार इतने उपेक्षित और पददलित क्यों हैं? इस विरोधाभास पर हमें विमर्श तो करना ही चाहिए।
लेकिन सवाल पूछने से ही नये विमर्श पैदा भी होते रहेंगे। आदमी बनने के लिए यही
प्रकिया है और आदमियत का प्रोजेक्ट तो अभी भी अधूरा है.
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