Tuesday, January 8, 2019

यार, मुझे किसी लफड़े में नहीं पड़ना....

यारमुझे किसी लफड़े में नहीं पड़ना....
इस लफड़े ने हम सब को गूंगा बना रखा है...
एक महिला को सरेआम ट्रेन/बस/बाजार में छेड़ा जाता है. हम तमाशबीन बने रहते हैं. क्योंकि हम लफड़ा नहीं चाहते.
एक बच्चा/बच्ची/महिला शारीरिक और यौन हिंसा के शिकार है. पड़ोसियों को सब पता है. हम इसकी शिकायत नहीं करते. हम आगे नहीं आना चाहते. क्योंकि हम लफड़े में नहीं पड़ना चाहते.
एक व्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त होकर सड़क पर पड़ा है. हम वहां से चुपचाप निकल जाते हैं क्योंकि हम लफड़े में नहीं पड़ना चाहते.
आपके कार्यालय में भ्रष्ट गतिविधियाँ हैं. आप जागरूक हैं लेकिन लफड़े में नहीं पड़ना चाहते.
क्या हमारा जीवन 'लफड़ोंसे बचने के लिए बना हुआ है?
इन ‘लफड़ों का डर’ क्या ‘उस बच्ची/बच्चा/महिला के डर और उसके भविष्य’ से ज्यादा डरावना हैक्या हम एक नागरिक समाज है या आदम समाजक्या हमारा व्यक्तिगत हित नागरिक कर्तव्यों से उप्पर हैये कुछ सवाल हैं जिसका सामना हम किसी न किसी रूप में रोजाना करते हैं और रोजाना हालात से समझौता करते हैं.

सवाल है की एक आम आदमी किसी लफड़े में क्यों नहीं पड़ना चाहताये लफड़ा क्या चीज हैइस लफड़े ने हमें इतना दब्बू क्यों बना रखा हैइसका सीधा सा जबाब हैचुकि सिस्टम ईमानदारी से काम नहीं करताइसलिए लोग सिस्टम के लफड़े से बचना चाहते हैं. अगर यह प्रवृति घर कर रही हो तो जाहिर है सिस्टम अपनी कमियों से आपके वास्तविक शिकायत को भी लफड़ों में बदल देता है. हमारे यहाँ शिकायतों को निपटाने की और बंद करने की परिपाटी है. उसका वास्तविक समाधान कभी नहीं किया जाता. शिकायतकर्ता कई बार ठगा हुआ महसूस करता है जैसे विज्ञापन देखकर सामान ख़रीदा और धोखा खा गया. जब हम शिकायत निवारण एजेंसियों का विज्ञापन देखते हैं तो मन में एक आस जगती है. उम्मीद जगती है कि गलत करने वालों को सजा जरुर मिलेगी. लेकिन जब हमें खुद उन एजेंसियों की जरुरत पड़ती है तब पता चलता है कि विज्ञापन देखकर फिर धोखा खा गए. कुछ सुलझाने के उम्मीद में आप खुद उलझ जाते हैं. ये प्रवृति लफड़े को जन्म देती है और फिर लफड़े से ऐसे डरते हैं जैसे सामने कोई भूत खड़ा हो.

देश में भ्रष्टाचार/ बाल श्रम/ बाल/ यौन उत्पीड़न/ दहेज़ एवं घरेलू हिंसा/ बलात्कार/ सामाजिक भेद भाव से संबंधित निषेध कठोर सामाजिक विधान पहले से ही उपलब्ध है. फिर ऐसा क्या है की उपरोक्त विधानों के वावजूद उसके उल्लंघन के आकड़ें बढ़ते ही जाते हैंक्या किसी भी वर्ष में इन आकड़ों में कमी आई हैऐसा क्यों हैंक्या इन सामाजिक विधानों के दार्शनिक पहलूसमाज के नैतिक और अनैतिक प्रश्नों के हल करने में असफल हो रहे हैं ? या फिर नागरिक समाज सिस्टम के लफड़ों से वास्तव में डरने लगा है. कहा जाता है की सता भ्रष्ट बना देती हैतो क्या नागरिक संस्थाएं भी भ्रष्ट बना देती हैऐसा क्यों होता है कि सिर्फ एक नैतिक और ईमानदार व्यक्ति के सक्रियता से उस संस्थान का साख बनता है. इसका मतलब है कि नैतिक और ईमानदार सक्रियता के कमी के कारण सिस्टम लफड़े जैसे मानसिक और सामाजिक बीमारी को जन्म देता है. नतीजा सामाजिक विधान महत्वपूर्ण होते हुए भी निष्क्रिय बने रहते हैं.

जब तक हम सब इन लफड़ों से डरना नहीं छोड़ेंगे तब तक सिस्टम भी सक्रीय नहीं होगा. क्योंकि सिस्टम में बैठा आदमी भी इन्हीं लफड़ों से डरा हुआ है. फिर तो डॉक्टर (सिस्टम) और मरीज (जनता) दोनों ही बीमार हैं. इसका इलाज कौन करेगाजाहिर है दोनों को ही सक्रीय होना पड़ेगा. लफड़ों से डरना बंद कीजिये अन्यथा हम सब एक सनक के शिकार हो जायेंगे.


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