हम सभी
के पास अपने विचार हैं । कल्पनायें हैं । अपना जीवन अनुभव है। अपना जीवन संसार है।
जब हम इन्हें सुसंगत करते हैं तब यह ज्ञान का हिस्सा बन जाता है। लेकिन इन दिनों
हमारे पास हॉट नॉलेज (रेडीमेड ज्ञान) मीडिया और सोशल मीडिया के जरिये इतना तेजी से
आ रहा है कि अपने अनुभवों को, कल्पनाओं को सुसंगत करने
का अवसर ही नहीं मिलता। एक अदद नौकरी की तलाश और अनचाही नौकरी के साथ तालमेल की
कवायद ने हमें इस लायक छोड़ा ही नहीं है कि हम सुकून से कुछ सोच सकें। कुछ रचनात्मक
कर सकें। आज के दौर में जब तक हम कुछ क़ाबलियत हासिल करते हैं तब तक क़ाबलियत के
पैमाने बदल दिए जाते हैं।
हम सब
मजबूरी में 'ऐकडेमिक रिचुअल्स' के
शिकार होते जा रहे हैं। डिप्लोमा और पीएचडी ने हमारे जीवन के सुकून को छीन लिया
है। एक डिप्लोमा खत्म नहीं होता कि दूसरे डिप्लोमा की मांग बढ़ जाती है। रोनाल्ड
फ़िलिप डोर के अनुसार एक तरह से हम 'डिप्लोमा डिजीज' के शिकार हो गये हैं। पीएचडी पूरा होते ही शोधपत्र और टीचिंग की कसौटियां
बदल दी जाती है। उम्रसीमा के तकाजे लाद दिए जाते हैं। शिक्षा के मूल्य और रोजगार
में इतनी गहरी खाई पैदा कर दी गयी है कि शोधार्थियों को एक बौद्धिक जमात के बजाये
अवशिष्ट श्रेणी (बेकार) मान लिया गया है।
आजकल हर
जगह मानव संसाधन विभाग का बोलबाला है। लेकिन तथाकथित मानव संसाधन वालों ने ही मानव
का अवमूल्यन करने का बीड़ा उठा लिया है। मानव संसाधन इन दिनों विश्वविद्यालयों के
मृत्यु काव्य रचने में व्यस्त हैं। विश्वविद्यालय का मौत समाज का मौत है। प्राचीन
नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला विश्वविद्यालय के मौत
ने उस समय के समाज को आताताई बना दिया था। विश्वविद्यालयों का स्वायत स्वरूप आज
जिस तेजी से खत्म हो रहा है। उससे आने वाले दिनों में हम एक जड़विहीन समाज में
तब्दील होने वाले हैं ।
इतिहास
के एक मित्र ने बताया कि मार्क्स के जन्म से भी पहले ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज के
विद्यार्थी भी गरीबों के बीच जाकर उनको वर्तमान दशा से बाहर निकालने के लिये एक
मुहिम चलाया करते थे लेकिन गरीबों को ऐसी जानलेवा बीमारियां थी कि उन बीमारियों के
चपेट में हजारों छात्रों की मौत हो जाया करती थी। उस समय मेडिकल साइंस इतना विकसित
नहीं था फिर भी वो कारवां रुका नहीं। ये दोनों विश्वविद्यालय आज भी दुनिया के
सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय में से एक हैं और हजार साल पुराने हैं। लेकिन हम है कि
जो पहले से ही सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय हैं उसे भी तबाह करने पर तुले हुए हैं।
कभी फिनान्सिंग के नाम पर, तो कभी गुणवत्ता के नाम पर, तो कभी नियंत्रण के नाम पर विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता लगातार खतरे में
हैं ।
कहते हैं
हमारे प्राचीन विश्वविद्यालय नालन्दा में भी छात्रों का अपना स्वायत संध हुआ करता
था। यूँ कहिये उनका खुद का स्टूडेंट यूनियन था। लेकिन आज हम छात्रों की स्वायत्तता
से इतना क्यों डरते हैं। छात्रों के बौद्धिक विमर्श को संदेह की दृष्टि से देखा
जाने लगा है। वैसे छात्र भी उतना ही एक बौद्धिक वर्ग है जितना समाज का सम्पन्न
तबका खुद को समझता है। वो अपना नफा नुकसान समझते हैं। विश्वविद्यालय कारखाने में
तब्दील किये जाने लगे हैं। अब पठन-पाठन और बौद्धिक विमर्श से ज्यादा हाजिरी
रजिस्टर महत्वपूर्ण हो गया है। विचार से इतना डर है कि शोध परीक्षाएं वस्तुनिष्ठ
होने लगी है। विदेशी विश्वविद्यालयों में आज भी प्रवेश निबंध शैली के जरिये ही
होता है। लेकिन हम हैं कि रचनात्मकता से डरने लगे हैं। पठन-पाठन के जगह पर तकनीकी
खामियों को महत्व दिया जाने लगा है।अनुशासन के नाम पर व्यापक निगरानी बढ़ा दिया गया
है। छात्रों के जो पब्लिक स्पेस थे उसे प्राइवेट स्पेस में बदलने की मुहिम चल रही
है। देश का एक नामी विश्वविद्यालय जेएनयू इन दिनों इसी तरह के तुगलकी फरमानों का
गढ़ बन चुका है।
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