मैं मछली हूँ
एक ठहरे तालाब में रहती हूँ
मैं जिस पानी की मछली हूँ
उसमें हवा नहीं है
दम घुटता है यहाँ
ऊपर से बड़ी मछलियां भी मुझे खाने को तैयार बैठी हैं
आदमी के जाल से तो रोज
बड़ी मुश्किल से बचती हूँ
कहते हैं जब प्रलय आया था
मछली ने ही मानव को बचाया था
पर मुझे कैद करने के लिए
सबसे पहले आदमी ने ही जाल बुना था
खैर, आदमी तो अपने ही जाल में फंस गया
लेकिन आह! कहाँ मैं गहरे पानी की प्यासी
कैसे ठहरे तालाब में फंस गई?
मुझे तो बहते जाना है
नदी की, समुद्र की
लंबी यात्राएं करनी है
अहा! आने दो बारिश को
तालाब को भर जाने दो
मैं छलांग लगाउंगी ऐसी
कि नदी आयेगी पास मेरे
समुद्र में मिल जाने की
अहा! सपने सच होंगे.
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