Thursday, January 24, 2019

मन की किताब

लोग कहते हैं, मैं हूँ 'खुली किताब'
लेकिन खुली किताब को पढ़ता नहीं कोई मन से
कि खुली किताब को पढ़कर लोग डाल देते हैं
अखबार की रद्दी में,
जो हर महीने बिक जाता है कबाड़ी में
कि खुली किताब के पन्ने सड़को पर पड़े होते हैं
जिसे रौंद कर कोई भी निकल जाता है
आदमी को हो जाना चाहिए लाइब्रेरी की किताब,
कि जिसे जरूरत है, वही आकर पढ़े.
'मन की किताब' पढ़ने के लिए चाहिए थोड़ा धैर्य
कि मन को नहीं पढ़ा जा सकता 'खुली किताब' की तरह

No comments:

Post a Comment