Sunday, January 27, 2019

ये दुनिया मिल भी जाए तो क्या?

पैसा, प्यार और शोहरत जीने के लिए होता है,
दिखाने के लिए नहीं!

आपका पैसा, प्यार और शोहरत किसी की
हँसी बचाने के लिए होना चाहिए,
किसी की खुशियाँ छीनने के लिए नहीं।

Friday, January 25, 2019

क्षतिग्रस्त

क्या हम इस दुनिया में थोड़े टूटे हुए नहीं हैं?
अजीब सी मुस्कान के साथ
क्षतिग्रस्त सामान की तरह
जिसे चिपकाने के लिए
करता हुआ 'गोंद की खोज' आदमी
जिसे लोग प्यार कहते हैं
लेकिन क्षतिग्रस्त सामान की मरम्मत
क्या सिर्फ गोंद से संभव है?  
जैसा कि मीर ने कहा है
'प्रेम एक भारी पत्थर है।
कैसे उठेगा तुम जैसे कमजोर से'
उसे उठाकर चलने के लिए
चाहिए एक मजबूत हृदय

Thursday, January 24, 2019

मन की किताब

लोग कहते हैं, मैं हूँ 'खुली किताब'
लेकिन खुली किताब को पढ़ता नहीं कोई मन से
कि खुली किताब को पढ़कर लोग डाल देते हैं
अखबार की रद्दी में,
जो हर महीने बिक जाता है कबाड़ी में
कि खुली किताब के पन्ने सड़को पर पड़े होते हैं
जिसे रौंद कर कोई भी निकल जाता है
आदमी को हो जाना चाहिए लाइब्रेरी की किताब,
कि जिसे जरूरत है, वही आकर पढ़े.
'मन की किताब' पढ़ने के लिए चाहिए थोड़ा धैर्य
कि मन को नहीं पढ़ा जा सकता 'खुली किताब' की तरह

क्या आप कभी खुद को दोषी महसूस करते हैं?"
"हाँ," मैंने उत्तर दिया।

"लेकिन केवल इसलिए कि मुझे यह महसूस करने में इतना समय लगा है कि मैं कौन हूँ और वास्तव में मेरे दिल में क्या है।"

जो थोड़ा सा प्यार होता है,
उसे भी मुश्किल होता है भूलना
जो थोड़ी होती हैं यादें
वे भी जीने के लिए होती हैं काफी
कि प्रेम जब इबादत होता है
कहाँ वो जिंदगी का मोहताज़ होता है
उसके लिए ताउम्र की जा सकती है दुआ
कि उसके याद में गुजारी जा सकती है पूरी जिंदगी
कि वह फरिश्तों जैसी है
और फरिश्तों से मुलाकात भला कहाँ होता है!

Wednesday, January 23, 2019

यद्यपि, मैं पुनः उगूँगा
पेड़ बनूंगा एक दिन
खिलेंगे मुझमें भी फूल
चिड़ियों का होगा मुझमें बसेरा
दुनिया को दूंगा छाँव
कि छांव के लिए
लोग कितना भटकते हैं

नजरिया


Tuesday, January 22, 2019

तुम्हारे होने से

तुम न आते तो
हमारे अंदर एक सभ्यता मर चुकी होती!
तुम्हारे होने भर से ही है मिलता
मकसद जीने का!
तुम्हारे होने भर से ही
जगती है एक उम्मीद!
तुम्हारे होने भर से ही है
सपनों को देखा जाना!
तुम्हारे होने भर से ही है
ये दुनिया खूबसूरत!

Sunday, January 20, 2019

मैं भी चाँद हूँ

चाँद कितना अकेला है
उसकी नियति है
आधा अधूरा रहना
कभी चमचमाना तो कभी
अंधरे में डूब जाना
कभी अमावस तो कभी पूर्णमासी हो जाना
तमाम चमचमाते तारों के बीच भी हौसला न खोना
मैं भी चाँद हूँ!

Saturday, January 19, 2019

प्लास्टिक


दिल भी मानो प्लास्टिक है
टूटता है पर आवाज नहीं करता
क्रेडिट कार्ड की तरह
प्रेम भी अब किस्तों का मोहताज है
प्रेम का गारंटी और वारंटी अब
बाजार में तय होता है
जो टूटता है एक बार
फिर नहीं जुड़ता
उधार कि जिंदगी है
उधार की ख़ुशी है
प्लास्टिक मनी और प्लास्टिक सेक्सुअलिटी का जमाना है
पलास्टिक की तरह टूट कर बेकार हो जाना है

Wednesday, January 9, 2019

आधे अधूरे


एक बड़ा सपना  
एक सच्चा प्रेम
एक मनचाहा साथी
एक अर्थपूर्ण काम
हालात की बेबसी
और फिर जद्दोजहद
जिंदगी बन जाती है
एक अधूरी कहानी
जिंदगी जितनी बहुरंगी है
उतनी ही उलझनों से भरी है.





तुम , मेरी धरती हो!

तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ
जैसे चाँद जीता है
धरती के लिए

दिन भर तपती है धरती जब सूरज की आग में
गुस्से में लाल पीली हो जाती है शाम में
शाम ढ़लते ही तब
चुपके से आता है चाँद बाहर
धरती के उलझन देख, चुपचाप उसे सुलझाता है 
करता है अपनी रौशनी से धरती को शीतल
धरती खुश होती है चाँद के इस ख्याल से
याद करती है जब धरती उसे दिल से
वह अधूरा से पूरा होकर पूर्णिमा बन जाता है

पर चाँद की नियति है
आधा अधूरा रहना
कभी चमचमाना  तो कभी स्याह अंधरे में डूब जाना
वह जितना शोख़ है, उतना ही है अकेला
तमाम चमकते तारों के बीच
उसे बचाना होता है अपना वजूद
इसके लिए उसे जाना पड़ता है धरती से दूर
इस फासले से धरती होती है ख़फा
फिर कई दिनों तक रहता है वह संताप में
कमी आ जाती है उसके भी प्रताप में 
वह गुम होता जाता है, इतना गुम कि 
वह बन जाता है अमावस की रात
धरती भी डूब जाती है अथाह अँधेरे में

स्याह अंधरा करता है दोनों को ही बीमार
धरती समझ जाती है चाँद की लाचारी
चाँद भी चाहता है धरती को टूटकर
रात जागकर करता है उसकी तीमारदारी
करता है धरती को चाँद रौशन
होते हैं दोनों के गिले शिकवे दूर
चाँद फिर से खिलखिला उठता है
धरती के सीने में भी उठता है ज्वार
रचते हैं दोनों सौदर्य की अप्रतिम कविता
अँधेरा छंटता है होता है सवेरा
इस तरह फिर से होती है उनकी दुनिया गुलजार

हाँ, मैं तुमसे प्रेम करता हूँ
उसी तरह जैसे चाँद करता है


धरती से
तुम मेरी धरती हो !

Tuesday, January 8, 2019

# Me,Too


अभी जो # मी टू आंदोलन है वो एक पुरुष विशेषाधिकार के खिलाफ अपनी पहचान का भी एक आंदोलन है और इस आंदोलन ने एक झटके में पुरूषों के सोचने के रवैये में थोड़ा बदलाव तो लाया ही है। इसे आप उच्च और कुलीन महिलाओं का सवाल कहकर खारिज नहीं कर सकते। इससे महिलाओं के सवाल पर पुनः विमर्श बढ़ा है। इसी तरह दलित और आदिवासियों के बौद्धिक वर्ग के सक्रियता को यह कहकर खारिज नही कर सकते कि वे अपने समुदाय का सही प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। राजनीति और बौद्धिकता दोनों अलग अलग विषयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रतिनिधित्व के लिए हमें ऊपरी पायदान पर पहुँचना ही पड़ता है। कमजोरों के आंदोलन को एक जमीनी बौद्धिक खुराक की जरूरत पड़ती ही है। इसलिए हक जमाये हुए लोग जमीन से जुड़े बौद्धिक वर्ग से ज्यादा नफरत करते हैं। तमाम तरह के आस्थाविहीन, अराजकतावादी रूपक का इस्तेमाल कर उनका दमन किया जाता रहा है। सवाल है कि सवाल उठाने वालों से कौन डरता है? विशेषाधिकार जमाये लोग न सिर्फ सवालों से डरते हैं बल्कि सवाल उठाने वाले का दमन भी करते हैं।

यह ठीक है कि # मी टू एक वर्गीय परिघटना है। जिसके पात्र दोनों तरफ से बौद्धिक वर्ग हैं।  यह कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के खिलाफ एक आंदोलन है . यह बौद्धिक स्त्री-पुरुषों का विमर्श है और अगर फ्रेंच फिलॉसफर जैक देरिदा के मार्फ़त कहें तो यह बौद्धिक विखंडन (डीकंस्ट्रक्शन) की एक प्रक्रिया है,  जहाँ  टेक्स्ट को ही यदि विमर्श के जरिये उघाड़ा जाए तो हमारे टेक्सचर का पता चलता है कि वास्तव में हम कितना दोहरा व्यक्तित्व जीते हैं?  गाँव, देहात और छोटे शहरों की स्त्रियों की आपबीती भी एक अनकही कहानी है। घास काटने वाली और जंगलो में लकड़ी काटने वाली औरतों का भी अपना # मी टू है। हाँ,  वे खुद विमर्श करने की स्थिति में नहीं है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वे अनभिज्ञ हैं या चेतनशील नहीं है बस ये है कि उनके पास # मी टू जैसा प्लेटफार्म या कोई सपोर्ट सिस्टम नहीं है। लेकिन इसका अर्थ ये नहीं है कि जिनके बारे में लिखा जा रहा है, विमर्श किया जा रहा है उसका असर नीचे तक नहीं होता है. यह सही है कि कानून ज्यादातर मामलों में सुविधाभोगी लोगो का ही पक्षधर होता है.

पहले जो यौन उत्पीड़न होता था उसे बौद्धिक लोग कहानियों या उपन्यासों का पात्र बनाते थे। आज वे पात्र खुद जिंदा हो गए हैं तो इतनी तकलीफ नहीं होनी चाहिए .  महिलाओं पर अपनी कलम चलाकर बहुत लोग बौद्धिकता के बादशाह बन गए थे. अब उनके पात्र ही जिंदा हो गए हैं. उन्होंने अपने बल-छल से उन्हें जिंदा ही मार दिया था. अब तक वे अपने मेथड से उत्पीड़ित का इतिहास लिख रहे थे अब उत्पीड़ित उनका इतिहास लिख रहा है. उन्हें दिक्कत है कि उनके ही मेथड से उनका इतिहास क्यों नही लिखा जा रहा?  जाहिर है उत्पीड़ित - उत्पीड़क का ऐसा मेथड क्यों अपनाएगा, जो वर्चस्व पर आधारित रहा हो?

उनके लिए अब # मी टू प्लेटफार्म  का उपयोग हो रहा है  क्योंकि उन्होंने उनकी आवाज को कई माध्यम से दबा रखा था. हमने ने ही उन सारी प्रक्रियाओं को मिथक में बदल दिया था कि तुम चाहे जो कर लो तुम मेरा कुछ बिगाड़ नहीं सकते. कुछ लोगों का कहना है कि यह सब स्टंट है, नाम कमाने का. पुराना रंजिश का बदला लेने का. अगर जब चीजे पब्लिक डोमेन में आती है तो उसे यूँ ख़ारिज नहीं किया जा सकता है. यह सब विमर्श का मामला है. इस तरह के विमर्श हमें खुद के अंदर झाकने का मौका देता है.  अब घरों से महिलाएं बाहर निकल रही हैं जाहिर है पुरुष वर्चस्व का पुराना मेथड टूटेगा. सवाल है जब हम  अपने ही मेथड के साथ खुद वस्तुनिष्ठ नहीं रहे तो हमारे लिए लिए भी वस्तुनिष्ठ मेथड का इस्तेमाल कैसे होगा

यौन उत्पीड़न को आप हमेशा वस्तुनिष्ठ (साक्ष्य केन्द्रित) तौर पर कैसे देख सकते हैं?  इसका असर तो मन मस्तिष्क पर होता है.  बालात्कार की परिभाषा ही खुद में किसी महिला के लिए कितना अवसाद पैदा करता है.  यह आपबीती वस्तुनिष्ठ भी हो सकती है और विषयनिष्ठ भी. हर अनुभव को अतिरेक कहकर टाला नहीं जा सकता है. यह सब हम फिल्मी अंदाज में फिल्मों में देखते ही रहते हैं.  बंद कमरे का समाजशास्त्र तो वैसे भी तुलनात्मक विधियों से ही ज्यादा वस्तुनिष्ठ होगा. बंद कमरे में या तो सामान्य घटना घटती है या असामान्य। बड़े कोठियों में अक्सर कांच टूटने का शोर दब जाता है। यौन उत्पीड़न के आंकड़े थानों में दर्ज होते हैं लेकिन जो दर्ज नही है इसका मतलब ये नहीं है कि वो आख्यान सच नहीं है जो आकड़ों में दर्ज नही है। आख्यान अब विमर्श का हिस्सा है और विमर्श सत्य तक पहुँचने का माध्यम भी है। अगर विमर्श न होता तो आज  महिला, दलित और आदिवासियों पर विमर्श की गुंजाइश ही नहीं होती। 'माता के देश में', और 'फल की चिंता के बजाये कर्म करो', वाले देश में आज स्त्रियां और कर्मकार इतने उपेक्षित और पददलित क्यों हैं? इस विरोधाभास पर हमें विमर्श तो करना ही चाहिए।
लेकिन सवाल पूछने से ही नये विमर्श पैदा भी होते रहेंगे। आदमी बनने के लिए यही प्रकिया है और आदमियत का प्रोजेक्ट तो अभी भी अधूरा है.

विचार और विश्वविद्यालय

हम सभी के पास अपने विचार हैं । कल्पनायें हैं । अपना जीवन अनुभव है। अपना जीवन संसार है। जब हम इन्हें सुसंगत करते हैं तब यह ज्ञान का हिस्सा बन जाता है। लेकिन इन दिनों हमारे पास हॉट नॉलेज (रेडीमेड ज्ञान) मीडिया और सोशल मीडिया के जरिये इतना तेजी से आ रहा है कि अपने अनुभवों कोकल्पनाओं को सुसंगत करने का अवसर ही नहीं मिलता। एक अदद नौकरी की तलाश और अनचाही नौकरी के साथ तालमेल की कवायद ने हमें इस लायक छोड़ा ही नहीं है कि हम सुकून से कुछ सोच सकें। कुछ रचनात्मक कर सकें। आज के दौर में जब तक हम कुछ क़ाबलियत हासिल करते हैं तब तक क़ाबलियत के पैमाने बदल दिए जाते हैं।

हम सब मजबूरी में 'ऐकडेमिक रिचुअल्सके शिकार होते जा रहे हैं। डिप्लोमा और पीएचडी ने हमारे जीवन के सुकून को छीन लिया है। एक डिप्लोमा खत्म नहीं होता कि दूसरे डिप्लोमा की मांग बढ़ जाती है। रोनाल्ड फ़िलिप डोर के अनुसार एक तरह से हम 'डिप्लोमा डिजीजके शिकार हो गये हैं। पीएचडी पूरा होते ही शोधपत्र और टीचिंग की कसौटियां बदल दी जाती है। उम्रसीमा के तकाजे लाद दिए जाते हैं। शिक्षा के मूल्य और रोजगार में इतनी गहरी खाई पैदा कर दी गयी है कि शोधार्थियों को एक बौद्धिक जमात के बजाये अवशिष्ट श्रेणी (बेकार) मान लिया गया है।

आजकल हर जगह मानव संसाधन विभाग का बोलबाला है। लेकिन तथाकथित मानव संसाधन वालों ने ही मानव का अवमूल्यन करने का बीड़ा उठा लिया है। मानव संसाधन इन दिनों विश्वविद्यालयों के मृत्यु काव्य रचने में व्यस्त हैं। विश्वविद्यालय का मौत समाज का मौत है। प्राचीन नालंदातक्षशिला और विक्रमशिला विश्वविद्यालय के मौत ने उस समय के समाज को आताताई बना दिया था। विश्वविद्यालयों का स्वायत स्वरूप आज जिस तेजी से खत्म हो रहा है। उससे आने वाले दिनों में हम एक जड़विहीन समाज में तब्दील होने वाले हैं ।

इतिहास के एक मित्र ने बताया कि मार्क्स के जन्म से भी पहले ऑक्सफ़ोर्ड और कैम्ब्रिज के विद्यार्थी भी गरीबों के बीच जाकर उनको वर्तमान दशा से बाहर निकालने के लिये एक मुहिम चलाया करते थे लेकिन गरीबों को ऐसी जानलेवा बीमारियां थी कि उन बीमारियों के चपेट में हजारों छात्रों की मौत हो जाया करती थी। उस समय मेडिकल साइंस इतना विकसित नहीं था फिर भी वो कारवां रुका नहीं। ये दोनों विश्वविद्यालय आज भी दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय में से एक हैं और हजार साल पुराने हैं। लेकिन हम है कि जो पहले से ही सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय हैं उसे भी तबाह करने पर तुले हुए हैं। कभी फिनान्सिंग के नाम परतो कभी गुणवत्ता के नाम परतो कभी नियंत्रण के नाम पर विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता लगातार खतरे में हैं ।

कहते हैं हमारे प्राचीन विश्वविद्यालय नालन्दा में भी छात्रों का अपना स्वायत संध हुआ करता था। यूँ कहिये उनका खुद का स्टूडेंट यूनियन था। लेकिन आज हम छात्रों की स्वायत्तता से इतना क्यों डरते हैं। छात्रों के बौद्धिक विमर्श को संदेह की दृष्टि से देखा जाने लगा है। वैसे छात्र भी उतना ही एक बौद्धिक वर्ग है जितना समाज का सम्पन्न तबका खुद को समझता है। वो अपना नफा नुकसान समझते हैं। विश्वविद्यालय कारखाने में तब्दील किये जाने लगे हैं। अब पठन-पाठन और बौद्धिक विमर्श से ज्यादा हाजिरी रजिस्टर महत्वपूर्ण हो गया है। विचार से इतना डर है कि शोध परीक्षाएं वस्तुनिष्ठ होने लगी है। विदेशी विश्वविद्यालयों में आज भी प्रवेश निबंध शैली के जरिये ही होता है। लेकिन हम हैं कि रचनात्मकता से डरने लगे हैं। पठन-पाठन के जगह पर तकनीकी खामियों को महत्व दिया जाने लगा है।अनुशासन के नाम पर व्यापक निगरानी बढ़ा दिया गया है। छात्रों के जो पब्लिक स्पेस थे उसे प्राइवेट स्पेस में बदलने की मुहिम चल रही है। देश का एक नामी विश्वविद्यालय जेएनयू इन दिनों इसी तरह के तुगलकी फरमानों का गढ़ बन चुका है।


यार, मुझे किसी लफड़े में नहीं पड़ना....

यारमुझे किसी लफड़े में नहीं पड़ना....
इस लफड़े ने हम सब को गूंगा बना रखा है...
एक महिला को सरेआम ट्रेन/बस/बाजार में छेड़ा जाता है. हम तमाशबीन बने रहते हैं. क्योंकि हम लफड़ा नहीं चाहते.
एक बच्चा/बच्ची/महिला शारीरिक और यौन हिंसा के शिकार है. पड़ोसियों को सब पता है. हम इसकी शिकायत नहीं करते. हम आगे नहीं आना चाहते. क्योंकि हम लफड़े में नहीं पड़ना चाहते.
एक व्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त होकर सड़क पर पड़ा है. हम वहां से चुपचाप निकल जाते हैं क्योंकि हम लफड़े में नहीं पड़ना चाहते.
आपके कार्यालय में भ्रष्ट गतिविधियाँ हैं. आप जागरूक हैं लेकिन लफड़े में नहीं पड़ना चाहते.
क्या हमारा जीवन 'लफड़ोंसे बचने के लिए बना हुआ है?
इन ‘लफड़ों का डर’ क्या ‘उस बच्ची/बच्चा/महिला के डर और उसके भविष्य’ से ज्यादा डरावना हैक्या हम एक नागरिक समाज है या आदम समाजक्या हमारा व्यक्तिगत हित नागरिक कर्तव्यों से उप्पर हैये कुछ सवाल हैं जिसका सामना हम किसी न किसी रूप में रोजाना करते हैं और रोजाना हालात से समझौता करते हैं.

सवाल है की एक आम आदमी किसी लफड़े में क्यों नहीं पड़ना चाहताये लफड़ा क्या चीज हैइस लफड़े ने हमें इतना दब्बू क्यों बना रखा हैइसका सीधा सा जबाब हैचुकि सिस्टम ईमानदारी से काम नहीं करताइसलिए लोग सिस्टम के लफड़े से बचना चाहते हैं. अगर यह प्रवृति घर कर रही हो तो जाहिर है सिस्टम अपनी कमियों से आपके वास्तविक शिकायत को भी लफड़ों में बदल देता है. हमारे यहाँ शिकायतों को निपटाने की और बंद करने की परिपाटी है. उसका वास्तविक समाधान कभी नहीं किया जाता. शिकायतकर्ता कई बार ठगा हुआ महसूस करता है जैसे विज्ञापन देखकर सामान ख़रीदा और धोखा खा गया. जब हम शिकायत निवारण एजेंसियों का विज्ञापन देखते हैं तो मन में एक आस जगती है. उम्मीद जगती है कि गलत करने वालों को सजा जरुर मिलेगी. लेकिन जब हमें खुद उन एजेंसियों की जरुरत पड़ती है तब पता चलता है कि विज्ञापन देखकर फिर धोखा खा गए. कुछ सुलझाने के उम्मीद में आप खुद उलझ जाते हैं. ये प्रवृति लफड़े को जन्म देती है और फिर लफड़े से ऐसे डरते हैं जैसे सामने कोई भूत खड़ा हो.

देश में भ्रष्टाचार/ बाल श्रम/ बाल/ यौन उत्पीड़न/ दहेज़ एवं घरेलू हिंसा/ बलात्कार/ सामाजिक भेद भाव से संबंधित निषेध कठोर सामाजिक विधान पहले से ही उपलब्ध है. फिर ऐसा क्या है की उपरोक्त विधानों के वावजूद उसके उल्लंघन के आकड़ें बढ़ते ही जाते हैंक्या किसी भी वर्ष में इन आकड़ों में कमी आई हैऐसा क्यों हैंक्या इन सामाजिक विधानों के दार्शनिक पहलूसमाज के नैतिक और अनैतिक प्रश्नों के हल करने में असफल हो रहे हैं ? या फिर नागरिक समाज सिस्टम के लफड़ों से वास्तव में डरने लगा है. कहा जाता है की सता भ्रष्ट बना देती हैतो क्या नागरिक संस्थाएं भी भ्रष्ट बना देती हैऐसा क्यों होता है कि सिर्फ एक नैतिक और ईमानदार व्यक्ति के सक्रियता से उस संस्थान का साख बनता है. इसका मतलब है कि नैतिक और ईमानदार सक्रियता के कमी के कारण सिस्टम लफड़े जैसे मानसिक और सामाजिक बीमारी को जन्म देता है. नतीजा सामाजिक विधान महत्वपूर्ण होते हुए भी निष्क्रिय बने रहते हैं.

जब तक हम सब इन लफड़ों से डरना नहीं छोड़ेंगे तब तक सिस्टम भी सक्रीय नहीं होगा. क्योंकि सिस्टम में बैठा आदमी भी इन्हीं लफड़ों से डरा हुआ है. फिर तो डॉक्टर (सिस्टम) और मरीज (जनता) दोनों ही बीमार हैं. इसका इलाज कौन करेगाजाहिर है दोनों को ही सक्रीय होना पड़ेगा. लफड़ों से डरना बंद कीजिये अन्यथा हम सब एक सनक के शिकार हो जायेंगे.


रोटी

एक रोटी फेकता है और एक रोटी पर भाषण देता है। जो रोटी फेकता है वो कभी नहीं चाहता कि तुम रोटी लपकना बंद कर दो। और जो रोटी पर भाषण देता है, वो चाहता है कि तुम ऐसे ही बने रहो ताकि उसके भाषण का सौंदर्य बोध बना रहे। तय करो कि तुम्हें क्या चाहिये?

Monday, January 7, 2019

उड़ान

वो कहती है
मुझे उड़ने का हुनर क्यों सिखाया?
वैसे तो
उड़ना ही धर्म है मेरा

पिंजरे का तोता तो
नहीं होना था मुझे
तुमने मुझे आजाद किया
उसके लिए शुक्रिया
अब जब आजाद हूँ तो
फिर सारा आकाश ही छान के
वापिस आऊंगी

मत करना इंतजार मेरा
और न वफ़ा की उम्मीद करना
जानती हूँ
ऊंची उड़ाने मुझे घायल कर देगी
फिर भी उडूंगी
घायल होकर भी वापिस आ सकी
तो मुझे माफ़ कर देना

जद्दोजहद

मैं मछली हूँ
एक ठहरे तालाब में रहती हूँ
मैं जिस पानी की मछली हूँ
उसमें हवा नहीं है
दम घुटता है यहाँ
ऊपर से बड़ी मछलियां भी मुझे खाने को तैयार बैठी हैं
आदमी के जाल से तो रोज
बड़ी मुश्किल से बचती हूँ

कहते हैं जब प्रलय आया था
मछली ने ही मानव को बचाया था
पर मुझे कैद करने के लिए
सबसे पहले आदमी ने ही जाल बुना था
खैरआदमी तो अपने ही जाल में फंस गया

लेकिन आह! कहाँ मैं गहरे पानी की प्यासी
कैसे ठहरे तालाब में फंस गई?
मुझे तो बहते जाना है
नदी कीसमुद्र की
लंबी यात्राएं करनी है
अहा! आने दो बारिश को
तालाब को भर जाने दो
मैं छलांग लगाउंगी ऐसी
कि नदी आयेगी पास मेरे
समुद्र में मिल जाने की

अहा! सपने सच होंगे.

प्रेम और सहवास


नियंत्रण


प्रेम का सरहद