Sunday, November 24, 2019

मन की नदी

वो नदी के तट पर बैठा
नदी को अपलक निहारता रहा था
नदी भी थोड़ी शांत थी
नदी ने धीरे से कहा ऐसे मत निहारो
मैं सूख जाऊंगी
वो कुछ कह पाता
पल भर में ही
नदी सचमुच सूख गयी थी
बदहवासी में वो नदी को रात भर पुकारता रहा था
उसके शब्द निर्रथक हो चुके थे
उसकी आवाज़ चली गई थी
और नदी अदृश्य हो चुकी थी
जिन पगडंडियों के जरिये वो नदी से मिला था
वे भी उसके साथ छोड़ चुके थे
आज भी 
जब भी बरसात आती है
वह नदी को ढूंढ़ने निकल जाता है।