Wednesday, February 13, 2019

देखो समय
ये जो
तुम रोजाना आ जाते हो
शाम को घनघोर अंधेरा बनकर
और मेरे अंदर शून्य भर देते हो

मैं विचलित नहीं होने वाला
तुम्हारे इस अशुभ आगमन से
मैं तमाम उम्र इसी तरह
अंधेरे को चीरकर
हर सुबह
फिर से तुमसे लड़ने के लिए तैयार मिलूँगा

क्योंकि
अब कलम ने अब मेरा हाथ थाम रखा है
सुकून है कि अब
अंधेरे को 'उजाला' लिख दूंगा
डर को 'जीत' लिख दूंगा
नफरत को प्यार लिख दूंगा
पर प्यार को 'प्यार' ही लिखूँगा
और इस तरह
अपने अक्षरों के साथ
मैं, तुम्हें
दुनिया में मासूम हँसी को बचाता हुआ मिलूँगा

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