Saturday, March 23, 2019

शब्द, जो कभी उसे तस्सली देते थे, अनौपचारिक हुआ करते थे, अब बेहद औपचारिक हो गए थे।
वो कविता में लिपटा हुआ,
टूटी हुई कविता के साथ मर रहा था
उसे जिन शब्दों पर अभिमान था,
उन्हीं शब्दों ने कर दी थी उसकी हत्या!

Monday, March 18, 2019

देखो साँझ
ये जो
तुम रोजाना आ जाती हो
घनघोर अंधेरा बनकर
और भर देती हो मेरे अंदर ‘शून्य’

फिर भी,
हर रोज तुमसे लड़ते हुए
प्रकाश का एक बिंब तो पैदा कर ही लेता हूँ
इस गहन उदासी में भी एक कतरा तो जी ही लेता हूँ
मैं तमाम उम्र इसी तरह
हर शाम,
इस अंधेरे से लड़ने के लिए तैयार मिलूँगा

देखों साँझ,
कलम से कर ली है मैंने दोस्ती
सुकून है कि अब
अंधेरे को 'उजाला' लिखा करूँगा
डर को 'जीत' लिखा करूँगा
नफरत को प्यार लिखा करूँगा
पर प्यार को 'प्यार' ही लिखूँगा
और इस तरह
मैं, तुम्हें
इस दुनिया में मासूम हँसी को बचाता हुआ मिलूँगा
मेरा विश्वास है,
एक दिन तुम भी अपनी संपूर्णता के साथ
मुझ में समा जाना चाहोगी

Wednesday, March 6, 2019


जिंदगी की थपेड़ों ने मुझे
बरगद बना दिया है
अब आंधी आये या तूफ़ान
मैं अपनी जड़ो पर खड़ा रहूँगा